शुक्रवार, 18 अगस्त 2017

!! भोर !!

जीवन के दुखद क्षणों के बाद
सबको होता भोर का इंतज़ार
भोर जो जीवन में भरे रोशनी
भोर जो जीवन से कराए प्यार।

निराशाओं की रात के पीछे
आशा का सूरज छुपा होता है
थोड़ा धैर्य थोड़ी-सी प्रतीक्षा
समय से ही सूरज निकलता है।

कभी कभी रात के बाद भी
सुबह में बादल उसे घेर लेता
सूरज की रोशनियों को वो
हम तक पहुँचने नही है देता।

कितना भी घना हो बादल
सूरज की भनक पड़ ही जाती
बादल की कालिमा कभी भी
सूरज की रोशनी रोक न पाती।

काले बादलों के पीछे से
सूरज की रोशनी फूट रही है
वो काली-सी दीवार कैसे
धीरे-धीरे कर टूट रही है।




!! साँझ !!

जाने का है गम फिर भी
देखो सूरज रंग बिखेरे कैसे
बादल आकाश पेड़ सब
साथ खड़े हो गए हैं जैसे।

मिलकर सब सजा रहे
रंगों का एक अद्भूत चित्र
मिलन जुदाई हर पल ही
मिलजुल कर रहते ये मित्र।

अपने-अपने हिस्से मिला
ये मनोरम छटा बना रहे हैं
कैसे मिलाए अपने-अपने रंग
शायद ये हमें समझा रहे हैं।

हर किसी के पास एक रंग
जीवन है एक बड़ा कैनवास
भर दे एक -दूजे में रंग ऐसे
कोई न रहे एकाकी उदास।

ये साँझ हमें समझा रही
जाने से पहले रंग बिखेर ले
रात के आने के पहले अपने
सूने कैनवास पे चित्र उकेर ले।

सोमवार, 24 जुलाई 2017

!! उसी की छाया में खड़े हो उसे पानी देने का सुकून !!


ये चिलचिलाती गर्मी जब
शाम भी लगती है दोपहर
नन्हीं घास से बड़े पेड़ तक
सब पे बरसे सूरज का कहर।

प्यासे पेड़ों को पानी देना
सावन-सा शीतल लगता है
घासों को जड़ से भीगोना
फागुन-सा मन को भरता है।

ढलती धूप, पानी का संग
तपिश को कम कर देती है
धीरे-धीरे गरम हवाएँ भी
खुद में ठंडक भर लेती है।

पेड़ों की छाया में खड़े हो
उनके ऊपर पानी बरसाना
हवा के साथ कुछ बूँदों का
फिर वापस हम पर आना।

बड़ा सुकून होता उन बूँदों में
अंतर्मन को तर कर जाती हैं
देने से ही दिल खिलता है
शायद यही हमें समझाती हैं।

इंसान हो या हो फिर दरख्त
अलग ही होता है
उसी की छाया में खड़े हो
उसे पानी देने का सुकून ।