शुक्रवार, 13 अक्तूबर 2017

!! ओस की बूँदें !!


रात में बनती है
सँवरतीं है
सुबह तक तो
पूरी तरुणाइ में होती है।

हरे-हरे घास के ऊपर
चाँदनी-सी चमकती
इतनी सुंदर कि जैसे
मृग की आँखें हो छलकती।

अकेली नहीं संग इसके
सखियाँ होती इसकी सारी
हवा कि संग मचलती
ये लगती मोती-सी प्यारी।

पर इनकी उमर है छोटी
एक छूअन एक ठोकर भर होती है
सूरज की रोशनी तो
एकबार में ही खत्म कर देती हैं।

लेकिन जब तक रहती चमकती
सुंदरता बिखेरती
भविष्य की चिंता से मुक्त
अपने हर पल को जीती।

ये ओस की बूँदें हैं जो
हर रात बनती सुबह मिट जाती है
हमारे आने-जाने की बारी भी
कुछ ऐसे ही तो आती है।

!! भोर !!


आसमा में चंद तारे अभी भी थे
कालिमा भी थी अभी चारों ओर
चाँद थोड़ा-थोड़ा मंद हो रहा था
नूतन की प्रतीक्षा थी  हर ओर।

हवा में भी ताजगी आ गयी थी
पेड़ रहे थे एक-दूजे को झकझोर
चिड़ियाँ चलने लगी झुंड बना
मचा रही थी वो संगीत-सा शोर।

सहसा प्राची में दिखी लालिमा
निकली जो कालिमा को तोड़
अब चाँद बिल्कुल मंद हो गया
तारे भी भाग चले आसमा छोड़

गुलाबी पीले रंग में पट गया
आसमा,जमीं,मन का हर कोर
फिर से सुंदरता भरने जीवन में
इक नया दिन लेकर आया भोर।

गुरुवार, 12 अक्तूबर 2017

!! आतिशबाजी !!


गगन को छूती आतिशबाज़ियाँ
रंग भर रहीं हैं देखो काली रात में
जमी से उड़ा रहे सैकड़ों सितारे
दे रहें आसमा को हम सौगात में।

हमारे नन्हें मुन्ने चाँद तारे जमीं के
ठान बैठे हैं अंधेरों से लड़ाई आज
हम भी उजाला करके ही मानेंगे
तुम अगर अंधेरे से न आए बाज ।

अमावस की काली रात भी आखिर
जगमगा गयी आज रंगो से नहा गयी
आज आसमान से चाँदनी नही उतरी
आज तो जमी ही रोशनी बहा गयी।