बुधवार, 2 मई 2018

पगडंडी के गीत

मद्धम मद्धम होने लगे
शोर सराबों की बीच
पर मशरूफ़ियत में भी  
मन को लेते वे खींच

कुछ यादें पुरानी
बचपन की कहानी
मन की मनमानी
क्या थी ज़िंदगानी

वो बचपन का गाँव
गाँव की वो पगडंडी
पगडंडी के वे गीत

मन की थिरकन
सिहरन हलचल
जीवन का संगीत

पगडंडी जैसे
अल्हड़-सी लड़की
भागे बलखाती
आरी-तिरछी

हरे-भरे वो खेत मानो
लहराती चुनरी उसकी
चिड़ियों की चहचहाहट
पायल की छमछम जिसकी

पके फ़सल लगते थे जैसे
उसके कानों की हो बाली
हल्के हवा के झोंके से
झूम पड़े बाली संग मतवाली

सीधे-साधे गाँव के लोग
उसके अपने घरवाले
चलती थी वो हँसती गाती
उन सबको संग संभाले

कोयल की कूक
भौरें की गुंजर
कितना सुंदर वो गाती थी

गाती नहीं
जीवन को जैसे
गोद ले सहलाती थी

गाँव छूटा
पगडंडी छूटी
छूट गए पीछे पगडंडी के गीत

बस एक जगह
रस्ता नहीं छूटा
छूटा मन का सबसे प्यारा मीत


सोमवार, 30 अप्रैल 2018

!! गवाह रहा है इतिहास !!

ताउम्र खेलता रहा था जो रंगों से 
अंतिम लिबास कितनी बेरंग उसकी
बिन पूछे जला आए उसे सब मिल
साँसे भी लेते थे इजाज़त से जिसकी।

महल मकान सब खड़े रह गए उसके
वो ख़ुद ही मिट्टी बन ख़ाक हो गया
अपनी टाँगी तस्वीरों के बग़ल में टंगा  
आग समझता था ख़ुद को राख हो गया।

उसके जाने के बाद भी चल रही दुनिया
बह रहे  हवा पानी जो भी काम जिसका 
इस आने जाने की मोहताज नहीं दुनिया 
गवाह रहा है इतिहास सदियों से इसका।

मन माँहीं उसे ढूँढ

हाँ रहता है मंदिर मस्जिद में
पर तेरे भीतर भी रहता वो
सुन तो ज़रा कभी ग़ौर से
बैठ भीतर क्या कहता वो।

ख़ुद को हो या उसको ढूँढना
बाहर नहीं ढूँढ बस अंदर अपने
अंदर है बसा साम्राज्य सुख का
समाए जाने कितने सुंदर सपने।

तू भी तो अपने ही भीतर और
वो कहाँ नहीं कण-कण में जो
आदि काल से अनंत काल तक
शाश्वत सनातन साथी तेरा वो।

तू भी भीतर वो भी भीतर
फिर बाहर क्या ढूँढे तू
मन माँहीं उसे ढूँढ,क्यूँ फिरे 
यूँ जीवन से रूठे-रूठे तू।